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क्या गूरू जरूरी है?

Posted On: 27 Nov, 2013 Others,social issues,लोकल टिकेट में

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धार्मिक परम्पराओं के आधार पर गुरु अपने अपराधों पर शिष्यों द्वारा पर्दा डलवाते हैं।
लोग क्यों अपने जीवन को गुरु के हवाले कर उनकी कठपुतली बन जाते हैं।
असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण ही लोग अपने बहुमूल्य जीवन को गुरु की खोज में लगाते हैं।
आखिर गुरु ऐसा क्यों चाहते हैं कि आप अपने दिमाग से सोचना बंद करें,  जो गुरु जो कहे उसका अंधानुकरण करें। सावधान हो जाइये ऐसे गुरुओं से जो कहें कि अपना मोबाइल मेरी फोटो के सामने रख कर चार्ज कर सकते हैं।
गुरुओं को चढ़ावा देकर आप अपनी किस्मत और भविष्य किसी वस्तु की तरह बाजार से नहीं खरीद सकते। इसे तो स्वयं बनाना पड़ता है।
जितना दान पर गुरुओं और मंदिरों को दान करते हैं यदि वह संसार के परोपकारों में लगाये जायें तो यह संसार भी स्वर्ग बन सकता है और हमें स्वर्ग के लिये अपनी सीट सुरक्षित नहीं करवाना पड़ेगी।धार्मिक परम्पराओं के आधार पर गुरु अपने अपराधों पर शिष्यों द्वारा पर्दा डलवाते हैं।

धार्मिक परम्पराओं के आधार पर गुरु अपने अपराधों पर शिष्यों द्वारा पर्दा डलवाते हैं।

लोग क्यों अपने जीवन को गुरु के हवाले कर उनकी कठपुतली बन जाते हैं।

असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण ही लोग अपने बहुमूल्य जीवन को गुरु की खोज में लगाते हैं।

आखिर गुरु ऐसा क्यों चाहते हैं कि आप अपने दिमाग से सोचना बंद करें,  जो गुरु जो कहे उसका अंधानुकरण करें। सावधान हो जाइये ऐसे गुरुओं से जो कहें कि अपना मोबाइल मेरी फोटो के सामने रख कर चार्ज कर सकते हैं।

गुरुओं को चढ़ावा देकर आप अपनी किस्मत और भविष्य किसी वस्तु की तरह बाजार से नहीं खरीद सकते। इसे तो स्वयं बनाना पड़ता है।

जितना दान पर गुरुओं और मंदिरों को दान करते हैं यदि वह संसार के परोपकारों में लगाये जायें तो यह संसार भी स्वर्ग बन सकता है और हमें स्वर्ग के लिये अपनी सीट सुरक्षित नहीं करवाना पड़ेगी।



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
December 18, 2013

सुन्दर बिचारणीय आलेख ,कभी इधर भी पधारें सादर मदन

harirawat के द्वारा
December 16, 2013

वाह दिनेश जी आपने तो मेरे मन के उदगार छीन लिए ! मेरे भी गुरु हैं और वे अँधेरे में मुझे रोशनी का आभाष कराते हैं, पता हैं वे कौन हैं ? वे हैं “पवन पुत्र हनुमान जी” ! ऐसा लगता है कि वे हर समय मेरे साथ हैं ! सुंदररचना के लिए साधुवाद ! हरेन्द्र जागते raho

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 12, 2013

आदरणीय आस्तिक जी, सादर अभिवादन ! आप ने बिलकुल सही कहा — ” दरिद्रे दीयते दानं सफलं पाण्डुनन्दन !” पुनश्च !!

vijay के द्वारा
December 6, 2013

जीवन में केवल अद्यात्मिक शिक्षक ही गुरु नहीं होता हमें ज्ञान देने वाला हर कोई शक्श गुरु बन सकता है पर हम हमेशा गुरु को अद्यात्मक दृष्टिकोण से लेते है यही से सारी समस्या शुरू होती है स्वर्ग नरक का धंधा शुरू होता है  आज कल तो लोग इस विषय पर बात भी नहीं करते कम से कम आपके ब्लॉग पर हम धरम भगवान् ,गुरु आदि पर बात तो कर लेते है धन्यवाद  

December 6, 2013

सादर प्रणाम! हकिअक्त तो यह है कि हम गुरु स्वयम बनाते है और वो भी स्वार्थ बस,जबकि कभी गुरु बनाया नहीं जाता. दूसरी बात गुरु शब्द को विशेष कर दिया गया है जबकि गुरु विशेष नहीं सार्व्भुमिक है. दुनिया और दुनिया के बाहर की हरेक चीज ………………..चाहे वो गलत हो या सही …..सब हमारी गुरु है.यह हम पर निर्भर करता है कि किसको किस अर्थ में लेते है…………………….

bhanuprakashsharma के द्वारा
November 28, 2013

गुरु वह है, जो अंधेरे से उजाले में जाने की राह दिखाता है। पर यहां तो गुरु ही चेलों को अंधेरे में धकेल रहे हैं। 

    dineshaastik के द्वारा
    November 28, 2013

    आदरणीय भानुप्रकाश जी, प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया के लिये आपका आभार।

    December 6, 2013

    अँधेरे से उजाले में जाने के लिए किसी को राह दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती………….उजाला स्वयं अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है…………..और यहाँ अँधेरा हो या उजाला दोनों ही गुरु बन जाते हैं………….जो इनका साक्षी साक्षी ……………


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