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ईश्वर और धर्म के जन्म का सिद्धाँत

Posted On: 24 Nov, 2013 Others,social issues,कविता में

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प्रजा मूर्ख थी औ अज्ञानी।
वो असभ्य थी औ अभिमानी।।
बंधन को थी नहीं मानती।
न ही नियमों को वो जानती।।
एक व्यक्ति था शक्तिशाली।
सत्ता उसने वहाँ बना ली।।
राजा बना बड़ा था ज्ञानी।
नियम बनाने की कुछ ठानी।।
विद्वानों को उसने ढूढ़ा।
संविधान फिर बना था पूरा।।
बने वही उसके दरवारी।
बने बाद में धर्माधिकारी।।
मान न उसको रही प्रजा थी।
राजा ने फिर उन्हें सजा दी।।
उनपर कुछ न असर पड़ा था।
राजा चिंचित हुआ बड़ा था।।
उसने विद्वानों से पूछा।
उनको इक उपाय था सूझा।।
ईश्वर फिर था एक रचाया।
संविधान को धर्म बनाया।।
कल्पित उसमें शक्ति सारी।
लालच दिया डराया भारी।।
स्वर्ग का लालच उन्हें दिखाया।
और नर्क से उन्हें डराया।।
ईश्वर के ये नियम हैं सारे।
हम सब उसके बेटे प्यारे।।
जो माने न उसका कहना।
उसे नर्क में पड़ेगा रहना।।
जो मानेगा उसकी बातें।
उसके लिये स्वर्ग सौगातें।।
डरे बहुत औ लालच जागा।
ईश्वर से डर सबको लागा।।
ऐसे बना धर्म औ ईश्वर।
राजा बना ईश पैगम्बर।।
राज्य के जो मंत्री अधिकारी।
बना दिया धर्माधिकारी।।
हुआ प्रजा का तब से शोषण।
हुआ बाहुबलियों का पोषण।।
धर्म ईश ने हमें ठगा जो।
वही लिखा, सच मुझे लगा जो।।



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
November 27, 2013

badi सहजता से सब कुछ कह दिया कविराज ने

    dineshaastik के द्वारा
    November 28, 2013

    आदरणीय दीपक जी, रचना की सराहना एवं प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आपका हृदय से आभार।

rajanidurgesh के द्वारा
November 27, 2013

दिनेशजी , नमस्कार आपकी रचना अत्यंत उत्कृष्ट एवं सत्यता से ओत-प्रोत है हार्दिक बधाई

    dineshaastik के द्वारा
    November 28, 2013

    आदरणीया रजनी जी, रचना की सराहना एवं प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आपका हृदय से आभार।

vijay के द्वारा
November 27, 2013

भाईसाहब नमस्ते काश के सब लोग धर्म का तर्क्रिक एवं दार्शनिक रूप समझ पाए जैसा अपने बताया है तो काफी हद तक समाज की समस्या कम हो सकती है बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं सटीक लेखन बधाई

    dineshaastik के द्वारा
    November 28, 2013

    आदरणीय भाई विजय जी, रचना की सराहना एवं प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आपका हृदय से आभार।

bdsingh के द्वारा
November 27, 2013

धर्मकी उत्पत्ति दर्शन समाहित करती सुन्दर रचना।

    dineshaastik के द्वारा
    November 28, 2013

    आदरणीय सिंह साहब, रचना की सराहना एवं प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आपका हृदय से आभार।

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 27, 2013

विचारणीय महत्वपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति सादर

    dineshaastik के द्वारा
    November 27, 2013

    आदरणीय यतीन्द्रनाथ जी, प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार।

yogi sarswat के द्वारा
November 26, 2013

पोल खोल अभियान !

    dineshaastik के द्वारा
    November 27, 2013

    आदरणीय योगी जी, प्रोत्यसाहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार।

alkargupta1 के द्वारा
November 24, 2013

राज्य के जो मंत्री अधिकारी। बना दिया धर्माधिकारी।। हुआ प्रजा का तब से शोषण। हुआ बाहुबलियों का पोषण।। धर्म ईश ने हमें ठगा जो। वही लिखा, सच मुझे लगा जो।। बहुत सही बहुत बढ़िया पोस्ट दिनेश जी

    dineshaastik के द्वारा
    November 26, 2013

    आदरणीया अलका जी, प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार।

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 24, 2013

aadarneey bhaai aastik jee , saabhivaadan ! apnee jagah aap bilkul sahee hain , sabhee ko apnee-apnee अभिव्यक्ति ke prateekaran kee chhoot hai ! badhaai !!

    dineshaastik के द्वारा
    November 26, 2013

    आदरणीय गुंजन जी, प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार।


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