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मंगल पाण्डे को मातादीन भंगी ने क्राँतिकारी बनाया

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बैरकपुर छावनी, कलकत्ता से मात्र 16 कि.मी. दूर।
कारतूस बनाने वाली फैक्ट्री, बहुत थी मसहूर।।
अन्य जातियों की तरह, दलित मजदूर भी वहाँ करते थे काम।
एक दलित मजदूर, जिसका मातादीन भंगी था नाम।।
उसे प्यास लगी, उसने एक सैनिक से माँगा जल।
उसे ब्राह्मण सैनिक का नाम था मंगल।।
पानी नहीं दिया उसे, डर था कहीं मेरा धर्म न हो जाय नष्ट।
उसकी इस सोच पर, दलित मजदूर को हुआ कष्ट।।
मुँह से गाय और सुअर की चर्बी के कारतूस खोलते हो।
इस पर भी अपने आपको ब्राह्मण बोलते हो।।
तुम्हारे ब्राह्मण धर्म को धिक्कार है।
एक प्यासे को पानी न पिला पाय, वह धर्म बेकार है।।
यह सुनकर मंगल पाण्डे हुआ बहुत हुआ चकित।
अंग्रेज करते रहे अभी तक हमें भ्रमित।।
उसकी आँखे क्रोध से लाल और पीड़ा से भर आई।
तुमने मेरी आँखें खोल दी मेरे हिन्दुस्तानी भाई।।
हम जैसे लोगों में ब्राह्मणत्व कहाँ से आयेगा।
अब यह हिन्दुस्तानी, एक हिन्दुस्तानी भाई को पानी जरूर पिलायेगा।
मातादीन भंगी ने मंगल पांडे को बना दिया प्रथम क्राँतिकारी।
हम मंगल पाण्डे से पहिले, मातादीन भंगी के हैं आभारी।।
जंगल में आग की तरह फैल गई, जो उन दोनों के बीच जो बात हुई।
10 मई 1857 को काँति की काँति की शुरुआत हुई।।
पहली दफा अंग्रेजों का शासन हिला था।
क्राँतिकारी गिरफ्तार हुये, चार्टसीट में मातादीन का नाम पहिला था।।
…………………
…………………
यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि जिस छुआछूत के कारण हम गुलाम हुये थे,
उसी छुआछूत के कारण एक अंग्रेजी सेना में कार्यरत युवक क्राँतिकारी बन गया।
इस तरह की घटनाओं से लगता है कि हमारे पुर्वजों को देश से प्यारा धर्म एवं जाति थी,
अन्यथा हम सैकड़ों वर्ष तक विदेशियों के गुलाम न रहते। हमारी इसी धर्म एवं जातिगत
आस्था के कारण आज की ये राजनैतिक भ्रष्ट जमात हम पर शासन कर रही है। भ्रष्टाचार
के मामले में सभी दल के नेता एक जुट हैं। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हमें जन्म
आधारित जातिप्रथा को समाप्त करके वेद में वर्णित कर्माधारित वर्णाव्यवस्था अपनाना
चाहिये।



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70 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

amanvalmiki के द्वारा
July 20, 2017

जानकारी से अवगत कराने हेतू आपका हार्दिक आभार आदरणीय़ दिनेश जी…।।

rajhans के द्वारा
May 13, 2012

बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं दिनेश जी और उतना ही सकारात्मक! धर्म ने जाति-व्यवस्था के मुद्दे पर तो तटस्थ रूख अपनाया था, आज हम उसी पाप का फल भोग रहे हैं| अगर एक मंगल पाण्डेय जाग सकता है तो हर कोई जागेगा| धीरे-धीरे ही सही| वो जागरण आंतरिक हो, राजनैतिक व्यवस्था या वाम-पंथिक विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं, हम सब इश्वर से यही प्रार्थना करते हैं|

    dineshaastik के द्वारा
    May 14, 2012

    राजहंस जी सचमुच अब समय आ गया है, यह सब कुछ बदलने का। क्यों न हम सब कुछ सार्थक् पहल करें। प्रतिक्रिया देने के लिये हृदय से आभार….

Arvind Kumar के द्वारा
May 13, 2012

बहुत ही मार्मिक तरीके से ऐतिहासिक तथ्यों का वर्णन किया है .. सराहनीय ..

    dineshaastik के द्वारा
    May 14, 2012

    अरविन्द जी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार…..

vinitashukla के द्वारा
May 12, 2012

इस ऐतिहासिक सच को साझा करने के लिए आभार दिनेश जी.

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय विनीता जी , प्रतिक्रिया देने के लिये आभार……

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 12, 2012

दिनेश जी……. मेरे मत से जाति एक उपाधि की भांति होनी चाहिए……. जो कृत्यों के अनुसार दी जानी चाहिए…. आज भी बेहद सरल स्वभाव के व्यक्ति को साधु व्यक्ति कहते हैं…… ब्राह्मण या कुछ अन्य नहीं……. क्योंकि उच्च कुल मे जन्मे लोगों ने अपने कृत्यों से अपने कुल को हानी ही पहुंचाई है……. बढ़िया रचना…….

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय पियूष जी आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। आइये हम सब मिलकर इस पर विचार करके, कुछ करने का प्रयास करते हैं। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार…

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 12, 2012

ऐतिहासिक इतिवृत्त को छंदोबद्ध कर आप ने श्लाघनीय कार्य किया है ,….अब समय आ गया है कि सबों को कर्माधारित वर्ण-व्यवस्था अपनानी चाहिए वरना समाज और टूटता चला जाएगा !! बड़े भाई जी,……..बधाई !!

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आचार्य जी नमस्कार हम सब मिलकर इसकी शुरूआत कर सकते हैं। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार….

sinsera के द्वारा
May 12, 2012

स्नेही दिनेश जी नमस्कार, ऐतिहासिक वृत्तान्त को कविता रूप देना आसान काम नहीं है….आप ने उसे बहुत खूबसूरती से निभाया…..बधाई…..

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय सरिता जी प्रतिक्रिया देने के लिये आभार…..

mparveen के द्वारा
May 12, 2012

दिनेश जी नमस्कार, ऐतिहासिक घटना को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार… काश सभी ऐतिहासिक घटनाएँ हमें इसी रूप में पढाई जाती तो इतिहास में भी अछे नंबर आ जाते :) लेकिन कोई गम नहीं अपने बच्चो को पढ़ा देंगे उनके लिए तो लाभ होगा … कोशिश की जाये तो हर सब्जेक्ट रोचक बन सकता है . धन्यवाद…

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय परवीन जी सच कहा आपने, यदि ऐतिहासिक घटनाओं को रोचकता के साथ बढ़ाया जाय, तो उन्हें समझने में एवं याद करने में बहुत ही आसानी रहेगी। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार…..

ajay kumar pandey के द्वारा
May 12, 2012

आदरणीय दिनेश आस्तिक जी नमन माँ की कहानी के बाद अब रूचि मैडम के काव्य लेख के साथ आया हूँ आशा करता हूँ की आप मेरी इस पोस्ट मेरी प्रिय शिक्षिका रूचि मैडम के काव्य लेख को समय देंगे और मार्गदर्शन करेंगे मुझे यह मंगल पाण्डेय जी वाला आलेख अच्छा लगा मेरी पोस्ट रूचि मैडम का काव्य लेख जरुर पढ़ें और मार्गदर्शन करें धन्यवाद

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    अजय जी निश्चित ही पढ़ूगा, प्रतिक्रिया देने के के लिये आभार…..

div81 के द्वारा
May 12, 2012

बहुत ही रोचक तरीके से इतिहास को कविता के जरिरे प्रस्तुत किया……………………….बधाई .

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय  दिव्या जी प्रतिक्रिया देने के लिये आभार…

अजय कुमार झा के द्वारा
May 12, 2012

बहुत खूब । बहुत ही भावपूर्ण रचना । आभार

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    अजय जी प्रतिक्रिया देने के लिये आभार….

akraktale के द्वारा
May 12, 2012

आदरणीय दिनेश जी नमस्कार, मुझे लगता है की हमारे पूर्वजों कार्य विभाजित किये होंगे जो आगे चलकर जातियों में तब्दील हो गया होगा. और फिर उंच नीच की परम्परा.किन्तु बुद्धि तो इश्वर का वरदान है उस इश्वर का जिसने तो मानव मानव के कोई भेद नहीं रखा. ज्ञानवर्धन कराती सुन्दर रचना बधाई.

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय अशोक  जी यही सच  है, वेदों में कर्माधारित  वर्णाव्यवस्था का वर्णन है। किन्तु बाद में हमारे पूर्वजों ने पुराण  आदि का सृजन  कर इसे जन्माधारित  सिद्ध कर अपना स्वार्थ सिद्ध  किया। कालान्तर में यही व्यवस्था हमारी गुलामी का कारण  बनी। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार…..

jlsingh के द्वारा
May 12, 2012

आदरणीय दिनेश जी, मैंने यह आलेख पढ़ा था और अपनी प्रतिक्रिया ढूढ़ रहा था पर मिली नहीं, शायद कहीं गुम हो गयी या मैंने तब न दी होगी! आपने सबसे जातिप्रथा के उन्मूलन का उपाय जानना चाहा है तो मेरे विचार से इसे सामाजिक परिवर्तन से ही धीरे धीरे दूर किया जा सकता है. धीरी धीरे हमलोग छुआछूत से तो उबार ही गए हैं. अब शहरों में जाती का मतलब सिर्फ शादी विवाह तक सीमित रह गया है. शादियाँ भी अब अंतरजातीय होने लगी हैं. परिवर्तन आ रहा है. पर धीरे… धीरे…. आपका यह ऐतिहासिक आलेख क्रांतिकारी परिवर्तन का आह्वान करता है! रचना की बेहतर ढंग से प्रस्तुति के लिए बधाई!

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीय जवाहर जी सच  कहा आपने परिवर्तन धीरे धीरे आयगा, लेकिन  क्या  आपको नहीं लगता कि हमें भी कोई सार्थक  प्रयास  करना चाहिये? प्रतिक्रिया देने एवं मार्गदर्शन करने के लिये आभार।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 12, 2012

आदरणीय दिनेश जी, सादर अभिवादन, जानकारी देने हेतु आभार. जातिविहीन सामज की स्थापना हेतु मैं पहले ही लेख पोस्ट de चूका हूँ. बधाई.

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीय  प्रदीप जी, सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, यदि आपका समर्थन है तो कृपया मार्गदर्शन  करें?

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 11, 2012

आदरणीय दिनेश सर, सादर प्रणाम वाह क्या खूब आपने १८५७ की क्रांति को दर्शाया है ………………..अद्बुत छुआ छूत अब बहुत हद तक कम हुआ है ……..किन्तु खत्म होने में समय लगेगा …..सार्थक

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    भाई आनन्द जी, नमस्कार। आप लोगों का समर्थन  मिला तो अधिक  समय नहीं लगेगा। क्या हम सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, यदि आपका समर्थन  है तो कृपया मार्गदर्शन करें?

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 11, 2012

बहुत देर से प्रतिक्रिया देने की कोशिश कर रहा हूँ,हर बार कुछ ना कुछ दिक्कत. अब कुछ नहीं कहना. ना इतिहास पर और ना ही जाति पर. बस इतना ही कहना है जो भी लिखा है , सुन्दर है.

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    अजय जी सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, यदि आपका समर्थन है तो कृपया मार्गदर्शन  करें?

Santosh Kumar के द्वारा
May 11, 2012

दिनेश जी ,.सादर नमस्कार बहुत सुन्दर सन्देश देती हुई रचना ,.जातिवाद का खात्मा जरूरी है ,..मातादीन का चरित्र फिल्म में भी दिखा था ,.मैं मानता हूँ कि हर क्रांतिकारी को कोई न कोई घटना उद्दिग्न करती है ,…जालियांबाला बाग कांड ने भगत सिंह और करतार सिंह सराभा जैसे क्रान्तिकारिओं को जन्म दिया ..धर्म ने ही देश को भयानक गुलामी के दौर में जोड़े रखा था ,.इसे जोड़े रखने के लिए जातिव्यवस्था का अंत होना ही चाहिए …समय लग सकता है लेकिन जो काम जरूरी होता है वो कभी न कभी जरूर होता है ,.. अच्छी पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    संतोष जी यदि यह जाति प्रथा समाप्त न हुई तो ये भ्रष्टाचारी चारा खाने वाले, तेलगी के द्वारा स्टाम् प पेपर  बिकवाने बाले, स्विसबैंक  में अरबों खरबों का धन इक्कठा करने वाले सदा सत्ता पर काबिज  होते रहेंगे। और हम  सब या तमाशबीन बने रहेंगे या मदारी के बंदर की तरह केवल  उछल  कूँद  करते रहेंगे। यदि मेरे अभियान में आपका सहयोग  मिल  गया तो कुछ  न कुछ  कामयाबी तो मिलेगी। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन  करें?

satyavrat shukla के द्वारा
May 11, 2012

बहुत ही सुन्दर रचना है ,और अपने इतिहास कि १ महत्वपूर्ण घटना को कविता मैं पिरो दिया है |

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    सत्यव्रत जी सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन  करें?

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 11, 2012

आस्तिक जी सादर नमस्कार- इतिहास को कविता में पिरोकर जतिबाद मिटाने का सुन्दर और सार्थक सन्देश देती रचना…………. देश के विकाश और सौहार्द में जतिबाद बहुत बड़ा रोड़ा है! इसे समाप्त होना ही चाहिए. मैंने भी कुछ काव्य कुंडली पोस्ट की है जो आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है.

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    अंकुर जी सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन  करें?

shashibhushan1959 के द्वारा
May 11, 2012

आदरणीय दिनेश जी, सादर ! “”" क्या अब समय नहीं आ गया है कि हमें जन्म आधारित जातिप्रथा को समाप्त करके वेद में वर्णित कर्माधारित वर्णाव्यवस्था अपनाना चाहिये।”"” बिलकुल समय आ गया है ! और समय आना क्या होता है, इन सब बातों की समीक्षा समय-समय पर करती रहनी चाहिए, इससे अनेक भ्रम दूर रहेंगे और समाज और व्यवस्थित रहेगा ! हार्दिक आभार !

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीय  शशि भूषण  जी सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन  करें?

yogi sarswat के द्वारा
May 11, 2012

सकी आँखे क्रोध से लाल और पीड़ा से भर आई। तुमने मेरी आँखें खोल दी मेरे हिन्दुस्तानी भाई।। हम जैसे लोगों में ब्राह्मणत्व कहाँ से आयेगा। अब यह हिन्दुस्तानी, एक हिन्दुस्तानी भाई को पानी जरूर पिलायेगा। आपने मुझे के नई जानकारी दी अपने लेखन के द्वारा ! शुक्रिया ! आपका लिखने का अंदाज़ बहुत प्रभित करता है ! बहुत सटीक विषय और रोचकता लिए हुए जानकारी भरा लेख !

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    योगी जी सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन  करें?

yamunapathak के द्वारा
May 11, 2012

वाह!ये हमें नयी जानकारी मिली,और इसे कविता में पिरोने से सुंदरता और बढ़ गयी. शुक्रिया

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    यमुना जी सादर नमस्कार। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन  करें?

vasudev tripathi के द्वारा
May 11, 2012

दिनेश जी, आप ज्येष्ठ हैं प्रबुद्ध हैं किन्तु फिर भी मैं कहना चाहूँगा कि न जाने क्यों अधिकांश लोग बिना गहराई मे उतरे विश्वास कर बैठते हैं…?? आप जिस बात का उल्लेख कर रहे हैं उसे अभी कुछ ही वर्षों पूर्व एक भद्रपुरुष ने अपनी किताब लिखकर उठाया था… मामला जाती से जुड़ा था अतः खूब चर्चित भी हुआ, मीडिया मे भी आया किन्तु जब इतिहासकारों ने उसपर प्रमाण मांगे और समीक्षा की तो लेखक महोदय के पास कुछ नहीं निकला… अंततः पूरी हवा को किनारे कर दिया गया और मीडिया भी हाथ झाडकर किनारे हो गई!! आज कई वर्ष बाद आप उस अप्रामाणिक किताब को आधार बनाकर कविता लिखते हैं तो निश्चित रूप से लगता है कि हमारी सबकी आदत नहीं रही गहराई मे जाने की… हम किताब या टीवी अखबार मे जो देख लेते हैं सही मान लेते हैं क्योंकि छपा जो है!! इस कहानी मे ऐतिहासिक दृष्टि से आप स्वयं सहजता से कई छिद्र ढूंढ सकते हैं… किन्तु अब जब लिखने वाला ही जब इसे सिद्ध न कर पाया हो तो दिमाग लगाने से अब कोई लाभ नहीं!!! हाँ, जातीय विद्वेष एक बुराई है इसका विरोध अवश्य होना चाहिए लेकिन इसकी आड़ मे इतिहास व बलिदानियों को जातिगत आधार पर बांटना ताकि कुछ चर्चा का विषय बनकर पोपुलरिटी हथिया ली जाए…, यह एक घटिया सोच है और अप्रामाणिक आधार पर जातीय रुख देने का प्रयास उपरोक्त पुस्तक के लेखक का ऐसा ही सस्ता प्रयास था। मैं आपको दोष नहीं देता क्योंकि प्रायः लोग अखबार या किसी किताब मे पढ़ी हुई चीजों को सच मान लेते हैं..!!!! …साभार!!

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी सादर नमस्कार। यह वृतांत  भारत  सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक  के आलेख  से लिया गया है। उस  घटना के संबंध  में अंग्रेजों द्वारा बनाई गई चार्जशीट  में पहला नाम  मातादीन  भंगी का था।  यह सर्वविदित है कि विदेशियों ने भारत  पर  विजय  हमारे सहयोग  से ही प्राप्त की थी। पहिले उपेक्षित  बौद्धों का सहयोग  लेकर भारत में प्रवेश  किया, फिर सामाजिक  रूप से  दबे, कुचले, पीड़ित  और उपेक्षित  जाति वर्ग  को अपने धर्म  में शामिल  कर उन्हें सम्मान पूर्वक  जीवन देकर उनके सहयोग  से भारत  पर शासन  किया। मेरी यह रचना काल्पनिक  नहीं है, इसको लिखने का उद्देश्य  किसी सम्मान को ठेस  पहुँचाना नहीं है, अपितु सत्य को प्रकट करके जाति कुप्रथा की बुराई की तरफ  लोगों का ध्यान  आकर्षित करना है। मैं कभी किसी बात का अंधानुकरण  नहीं करता, चाहे वह बात  मेरे इष्टदेव या सबसे  प्रिय व्यक्ति ने कही हो। मेरा विरोध  जन्माधारित जाति कुप्रथा से है, कर्माधारित  वर्णाव्यवस्था  से नहीं। यदि मेरी किसी बात से आपको आघात  पहुँचा हो तो उसके लिये मैं क्षमा माँगता हूँ। मेरा उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं है अपितु सत्य को प्रकट करना है। क्या हम  सब जन्माधारित  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन करें?

    sinsera के द्वारा
    May 12, 2012

    वासुदेव जी, नमस्कार, मैं ने आपके ब्लॉग पर पहले भी कहा था कि मेरी इतिहास में आस्था ही नहीं है क्यूँ कि हमारे अपने सामने की घटी हुई घटनाये भी कुछ दिनों के बाद किसी और ही रूप में सामने आती है तो सैकड़ों साल पहले घटी हुई घटना शब्दशः सत्य होगी, ऐसा भरोसा करना मुश्किल है.. हाँ आधार लिया जा सकता है लेकिन प्रमाणिकता का ठप्पा फिर भी कैसे लग सकता है…फिर भी जो साहित्य उपलब्ध है वही तो हमारी जानकारी का आधार है.किसी के पास टाइम मशीन तो है नहीं कि उस समय को फिर से देख सके.. इंडियन सिटिज़न होने के नाते इंडियन गजेट को ही सब से प्रामाणिक मानना हमारी मज़बूरी है.. टी वी और फिल्मों का तो भूल कर भी भरोसा न करियेगा…….अभी हालही में दिखाए गए शिवाजी के सीरियल को देख कर रोना आता है कि हम बचपन से क्या पढ़ते आये हैं और ये क्या दिखा रहे हैं.. जातीय विद्वेष भी हमारी ही उपज है..यहाँ लोगों कि कथनी और करनी में इतना अंतर है इसी लिए जातिप्रथा अभी तक चली आ रही है…थोडा पीछे जा कर देखिये तो समझ में आता है कि हमारे नाम के साथ लगे हुए “suffix” दरअसल ये बताते हैं कि हम किस परिवार के हैं न कि वर्ण को..उस को ले कर लड़ने कटने की या ऊँच नीच मानने की कोई वजह समझ में नही आती …और ऊपर से आरक्षण भी चाहिए …..सरकार दे भी रही है और जातिप्रथा के खिलाफ बड़ी बड़ी बातें करने वाले ले भी रहे हैं…वाह…..

    chaatak के द्वारा
    May 12, 2012

    यहाँ पर मैं वासुदेव और सरिता जी की बातों से इत्तेफाक रखता हूँ| मातादीन भंगी थे या मुसलमान, लेकिन अगर उनका तनिक भी योगदान स्वाधीनता संग्राम में था तो वे निश्चय ही पूज्य और आदरणीय हैं| अब सवाल उठता है आधुनिक विचारकों पर जो जातीय विद्वेष पर लम्बी चौड़ी बातें करते हैं- “आप जातीय आरक्षण को जिन्दा रखकर जाति व्यवस्था से मुंह कैसे मोड़ सकते हैं?”

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय सरिता सच कहा आपने। 1857 के इतिहास पर विस्वास करने के अलावा हमारे पास, और कोई रास्ता नहीं है। जबकि उस समय का इतिहास या तो अंग्रेजों द्वारा लिखा गया या अंग्रेजों के चाटुकार भारतियों के द्वारा। उसमें बाद में कुछ शोधन हुआ। यह भी एक सच है कि जाति प्रथा हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहा है। आज भी इस जाति प्रथा के कारण बहुत से अपराधी, भ्रष्टचारी एवं असभ्य लोग संसद में पहुँच कर बुद्धिजीवियों का मजाक उड़ाते हैं। आरक्षण से मुक्त होने के लिये जातिप्रथा से मुक्त होना बहुत जरूरी है। लेकिन कुछ दलित नेता अपनी वोट की राजनीति के कारण जाति प्रथा समाप्त नहीं होने देना चाहते। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार।

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय चातक जी नमस्कार, ये राजनेता जो अपने आपको दलितों का मसीहा कहते हैं। आंतरिक रूप से जाति प्रथा के समर्थक हैं। क्योंकि जातिप्रथा समाप्त समाप्त होने के बाद इनका राजनैतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। इनके पास इसके अलावा अन्य कोई दूसरा मुद्दा भी नहीं है। आइये इस संबंध में हम सब मिलकर विचार करें। प्रतिक्रिया देने के लिये हृदय से आभार….

    May 14, 2012

    काली मैया की जय …………………..! धन्य हो मेट आज पुरे विश्व आप जैसी माता की ही जरुरत है…..आपका यह रूप देखकर तो मैं खुद को गौरान्वित महशुस कर रहा हूँ..!

satish3840 के द्वारा
May 11, 2012

दिनेश जी क्रांतिकारी का बहुत ही ज्ञान वर्धक कविता / बधाई

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीय सतीश जी, प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?

rekhafbd के द्वारा
May 11, 2012

दिनेश जी सादरनमस्ते ,आपके विचारों से पूर्णतया सहमत ,देश के लिए हमे जाती धर्म से उपर उठाना पड़े गा क्रांतिकारी मातादीन और मंगल पांडे को शतशत नमन |आभार

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीय रेखा जी, प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?

May 11, 2012

दिनेश जी सादर ! जन्म आधारित जाति व्यवस्था ने ही हमारे हिन्दू धर्म का कबाड़ा कर रखा है अतः बिलकुल इसे कर्म आधारित होना चाहिए.

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    कुमार जी आपने समर्थन से मेरा हौसला कई गुना बढ़ गया। क्या आप  जादि कुप्रथा को नष्ट करने में मेरा सहयोग  करना उचित  समझेगें। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार……

    May 12, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, जाति प्रथा मेरी वो दुखती रग है जिस पर आपने हाथ रख दिया. आज हम हिन्दू अगर बंटे हुए हैं तो इसी घटिया जाति प्रथा के कारण. तथाकथित छोटी जातियों पर (क्योंकि मैं किसी जाति को छोटा या बड़ा नहीं मानता) धर्म की मनमानी परिभाषा गढ़ के शुरू से ही इतने अत्याचार हुए हैं कि आज उन्होंने हिन्दू धर्म के विरुद्ध ही आवाज उठा ली है, एक गुस्सा भर गया है उनमें. हिन्दू दलित जातियों में अक्सर होनेवाले धर्म परिवर्तन का एक कारण ये गुस्सा भी है. मैं एक हिन्दू हूँ और इस बात का मुझे गर्व है. इसलिए जो भी चीज मेरे हिन्दू धर्म को नुकसान पहुंचाए, मैं उसका नाश चाहता हूँ. मैं अंतरजातीय विवाह का भी समर्थक हूँ, क्योंकि मेरा मानना है की इससे हम इस जातिप्रथा को नष्ट कर सकते हैं…जाने कब ये जाति का चक्कर ख़त्म होगा?

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    गौरव जी क्यों न हम अपने विचारों को कार्यरूप में परिणित  करें।

चन्दन राय के द्वारा
May 11, 2012

दिनेश जी , सव्प्रथम ज्ञान वर्धन के लिए धन्यवाद , मंगल पाण्डेय पर ऐसी काव्य प्रस्तुति जो जुबान पर चढ़ बोले , मजा आ गया , कुछ नया सबसे अलग , फ़िलहाल पढ़ा सबसे बेहतरीन कविता

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    चंदन जी, प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?

tejwanig के द्वारा
May 11, 2012

रचना वाकई उम्दा है, आपको बधाई

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    तेजवानी जी नमस्कार, प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?

May 11, 2012

सादर प्रणाम! पहिली बात कि मैं मंगल पाण्डेय को देशभक्त क्रांतिकारी नहीं मानता….अब मानने वाले मानते रहे…….हाँ धार्मिक योधा जरुर मानता हूँ जो अपने धर्म कि आन के लिए विद्रोह किया न कि देश के लिए……………….!

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    अनिल  जी रचना के नीचे की पंक्तियाँ देखें, आपकी बात का समर्थन करती हुई पंक्तियाँ मैंने लिखी हैं। प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?

    May 12, 2012

    बिलकुल भैया जी, इसमे मार्गदर्शन की क्या आवश्यकता है…..यदि आप जैसे भाई हैं तो हम लोगो के सामूहिक प्रेस से हम जरुर सफल होंगे ….वैसे भी बदलाव शुरू हो गया है…आप स्वयम इसे देख रहे हैं…..पर मानसिकता अभी नहीं बदली है….उसके लिए हम सब को एकत्रित होकर एक आभियान चलाना ही होगा….और वो भी बहुत जल्द…आप बस तैयारी करिए…मैं लोगो को संगठित कर रहा हूँ….!

    dineshaastik के द्वारा
    May 13, 2012

    भाई अनिल जी हमारा प्रयास निश्चित ही कभी न कभी कामयाब होगा।

nishamittal के द्वारा
May 11, 2012

निश्चित रूप से अपनी कमियों के कारण ही हमने दासता झेली ,परन्तु उससे बड़ी विडंबना की आज भी हम शिक्षा नहीं ले पाए.

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    आदरणीया निशा जी, प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?

gopalkdas के द्वारा
May 11, 2012

वाह दिनेश जी बहुत ही अच्छी तरह से आपने इतिहास के पन्नों को फिर से हमारे सामने कर के हमारी सबसे बड़ी कमजोरी छुआ छूत पर अच्छा प्रहार किया है, हाँ सच है अगर हम धर्म और जाति में बटे न होते तो हम पर कोई भी शासन न कर पाता.. अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

    dineshaastik के द्वारा
    May 12, 2012

    गोपाल जी, प्रतिक्रिया देने के लिये आभार। क्या हम  सब  जाति कुप्रथा से मुक्ति पा सकते हैं. कृपया मार्गदर्शन करें?


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