samajik kranti

Just another weblog

69 Posts

1986 comments

dineshaastik


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

आजम खाँ की भैंसें

Posted On: 5 Feb, 2014  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

1 Comment

क्या गूरू जरूरी है?

Posted On: 27 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues लोकल टिकेट में

8 Comments

अंधविश्वास

Posted On: 25 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues में

4 Comments

ईश्वर और धर्म के जन्म का सिद्धाँत

Posted On: 24 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

16 Comments

कलयुगी गुरुगीता

Posted On: 22 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Entertainment Others social issues कविता में

4 Comments

बगावत

Posted On: 7 Apr, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

2 Comments

Page 1 of 712345»...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

श्वर के हाथ नहीं किन्तु अपने शक्ति रूपी हाथ से सबका रचन, ग्रहण करता। पग नहीं परन्तु व्यापक होने से सबसे अधिक वेगवान। चक्षु का गोलक नहीं परन्तु सबको यथावत देखता। श्रोत नहीं तथाकथित सबकी बातें सुनता। अंतःकरण नहीं परन्तु सब जगत को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं। उसको सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सबमें पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं। वह इन्द्रियों और अंतःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामर्थ्य से करता ह महर्षि दयानंद सरस्वती के गहन विचारों को रखने के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,.. कभी ईश्वर के बारे में इतना सोचा ही नहीं ,…शानदार लेख में तमाम प्रभावशाली तर्कों और विद्वतापूर्ण भाषा के बाद भी मूरख दिमाग असहमत ज्यादा है ,..क्षमा ईश्वर का प्रमुख गुण है ,.वो अनंत हैं ,सर्वशक्तिमान हैं ,.आदि हैं, अंत हैं ,..तो असंख्य भी हो सकते हैं ,..सबकुछ यदि निश्चित है तो जन्मजन्मांतर ,..अन्य लोक परलोक क्यों नहीं ….यदि वो अखंड हैं तो बहुखंड भी हो सकते हैं ,…उनके लिए कुछ दुर्लभ नहीं है ,..पाप पुन्य ,.गुण अवगुण ,सद्गुण सब उनका है ,..असल में हम मानते जरुर हैं किन्तु समझने को तैयार नहीं होते या ये कहूं की समझना नहीं चाहते ! वैसे कुछ बातें जो मान ली जाएँ तो ही ठीक हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

विजय जी ईश्वर के संबंध में यह विचार मेरे नहीं हैं, अपितु महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के हैं।ईश्वर के दया और न्याय के सिन्द्धांत पर में भी यकीन नहीं करता। इसके कई तार्किक कारण हैं। जिसका एक उदाहरण आपने भी दिया है। मेरा मानना है कि ईश्वर का जन्म डर और अज्ञान के मानव के स्वार्थ रूपी संसर्ग के कारण हुआ है। ईश्वर एक मानसिक कल्पना है। इस संबंध में मैं अपने पूर्व के आलेखों एवं कविताओं में बहत कुछ लिख चुका हूँ।जिस कारण से मैं अपने  कई ईश्वरवादी मित्रों का कोप भाजन हुआ हूँ। आलेख को पढ़ने, समालोचनात्मक प्रतिक्रिया देने के लिये हृदय से कोटि कोटि आभार......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय दिनेश जी ,..सादर महर्षि दयानंद सरस्वती के गहन विचारों को रखने के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,.. कभी ईश्वर के बारे में इतना सोचा ही नहीं ,...शानदार लेख में तमाम प्रभावशाली तर्कों और विद्वतापूर्ण भाषा के बाद भी मूरख दिमाग असहमत ज्यादा है ,..क्षमा ईश्वर का प्रमुख गुण है ,.वो अनंत हैं ,सर्वशक्तिमान हैं ,.आदि हैं, अंत हैं ,..तो असंख्य भी हो सकते हैं ,..सबकुछ यदि निश्चित है तो जन्मजन्मांतर ,..अन्य लोक परलोक क्यों नहीं ....यदि वो अखंड हैं तो बहुखंड भी हो सकते हैं ,...उनके लिए कुछ दुर्लभ नहीं है ,..पाप पुन्य ,.गुण अवगुण ,सद्गुण सब उनका है ,.. लेख को समझने के लिए पूरा ही नहीं कई बार पढने की भी जरूरत है ,..एक तरफ जहाँ "सकल पदार्थ हैं जगमाहीं" के आधार पर के आधार पर दूसरी दया को गैर जरूरी ठहराने का प्रयास गलत लगता है ,..ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता मानना अखरता है ,...उनके लिए क्यों कुछ असंभव है ?..असीमित मानते हुए सीमित समझने का अधूरापन किसलिए ,...निरंतर गतिशील ईश्वर में जब कुछ भी जड़ नहीं तो जड़ता क्यों लगती है ?...आदरणीय भरोदिया जी की प्रतिक्रिया से पूरा सहमत हूँ ,...इतनी कठिन भाषा में समझना मूरख के लिए तो असंभव है ..उजली चादर का कालापन जल्दी,दूर से और पहले दिखता है ,.....सद्कर्म के लिए प्रेरित करते विचारों से असहमति प्रकट हुई ,.. अज्ञान के लिए ह्रदय से क्षमा प्रार्थी हूँ....शानदार पोस्ट के लिए पुनः आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

डॉ. साहब, यह महान विचार विशुद्ध रूप से महर्षि दया नन्द जी के हैं। इन विचारों से इन्होंने देश में वैचारिक क्राँति ला दी थी। इन्होंने वास्तविक हिन्दु धर्म को शिखर पर पहुँचाने का प्रयास किया था, हिन्दु धर्म में अन्य धर्मों एवं मतों के संसर्ग के कारण जो भ्राँतियाँ आ गईं थी तथा कुछ शातिर बुद्धि वाले लोंगों ने अपनी आजीविका के चक्कर में गलत ढ़ंग से परिभाषित किया था। उन भ्राँतियों को दूर करके शुद्ध वैदिक धर्म का रास्ता दिखलाया था। हिन्दु धर्म पर अन्य धर्मों के हो रहे हमलों से रक्षा की थी। इन्होंने ने सभी धर्मों का तुलनात्मक विश्लेषण किया था। आलेख को पढ़ने, पसंद करने एवं समर्थन करते हुये प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार……

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

 ----परमेश्वर सगुण एवं निर्गुण दोनों है। गुणों से सहित सगुण, गुणों से रहित निर्गुण। अपने अपने स्वाभाविक गुणों से सहित और दूसरे विरोधी के गुणों से रहित होने से सब पदार्थ सगुण और निर्गुण हैं। कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जिसमें केुवल निर्गुणता या केवल सगुणता हो। किन्तु एक ही में निर्गुणता एवं सगुणता सदा रहती है। वैसे ही परमेश्वर अपने अनंत ज्ञान बलादि गुणों से सहित होने से सगुण रूपादि जड़ के तथा द्वेषादि के गुणों से प्रथक होने से निर्गुण कहलाता है। यह कहना अज्ञानता है कि निराकार निर्गुण और साकार सगुण है। --सचमुच हर व्यक्ति में ही ईश्वरीय गुण विद्यमान होते हैं और राक्षसी गुण भी। क्योंकि ईश्वर तो हर एक में विद्यमान है। ऐसे में हमें अपने भीतर के अच्छे गुणों को ही जगाना चाहिए। --सुंदर लेख के माध्यम से संदेश देने पर बधाई। 

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

सुन्दर लेख आपने तो जैसे सत्यार्थ प्रकाश का सार रख दिया.... पर मेरा मानना ये है की प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर कुछ न कुछ ईश्वरीय तत्व अन्तः करण में विद्यमान रहता है .. लेकिन यत्नपूर्वक कोशिस करने से उसे घटाया बढाया जा सकता है ,यह घटाव बढाव व्यक्ति के तीनो गुणों के मिलान से उत्पन्न कर्म पर आधारित होता है .. अतः कुछ लोग सत गुण को सभी गुणों से ऊपर रखते हुए अपने अन्दर के ईश्वरीय तत्व को बढाते है , इश्वर सबके अन्दर अपना तत्व समर्पित करके इस ब्रह्माण्ड में छोड़ देता है पर इस पृथिवी पर लोगो को स्थिति संभालने का वो ठीकेदार नहीं है .. उसका काम था की सबके साथ न्याय से बराबर इश्वर तत्व दे वो उसने कर दिया अब उस तत्व से परिपूर्ण समाज स्वयं की चेतना से चलता है.. कुछ ऐसे व्यक्ति जो की अपने अन्दर के ईश्वरीय तत्व को यत्नपूर्वक सद गुणों से इतना बाधा लेते है की न केवल उनका अन्तः करण बल्कि वो खुद पूरी तरह से ईश्वरीय बोध होने लगते है.. ऐसे लोगो को ही हम अवतारी , भगवान् इत्यादि नाम दे देते है चुकी वो खुद ईश्वरीय तत्व के निकट रहता है अतः उसमे श्रद्धा भाव रखने से किसी को कोई परेशानी भी नहीं होनी चाहिए... अंततः सभी ईश्वरीय तत्व किसी न किसी तरीके से आपस में जुड़े ही है , शायद इसीलिए इस देश में व्यक्ति व्यक्ति को इश्वर माना गया... बढ़िया लेख ... ...

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

कबूतरो से कह रहे हो कि बिल्ली को मारो शायद हिन्दू औरतो ने मरद पैदा करने बन्द कर दिए इसलिए इटली की राजक्मारी के अदना गुलाम क्या क्या जोश दिखायेंगे  गुलामी ने हिन्दुओ की जमीर को मार दियाहै  बहू बेटयो की ईज्जत लुटवा मुह फेर कर खडे हो जाते है पर जिस धरम व जाती के ऱाजनेता व धार्मिक नेता गदार हो जाये वह कभीनही उभर सकते    जराा सोचो  गान्धी नेहरू काा रोल और राष्ट्रपति कहता है आन्दोलन से अराजकतता फैलेगी  ये शंकराचार्य क्यो जोंक बने बैठे है मै राम देव का चेला नहीपर एक शंकराचार्य की  रामदेव  को सलाह पर कि साधु सन्तो कोइस पचडे नही पडना चाहिये पढ कर दुख हुआ

के द्वारा: snsharmaji snsharmaji

फलकीइच्छा न कर ये अर्थगलत हैबिना फल कीइत्छा केकोई करम नही होता हां फल की मात्रा पर   अधिकार नहींअब पहले से भी ज्यादा गलतिया कर रहे हैं  मन्दिरो मे अकूत चढावा जो  न तो गरीबो पर खर्च होता है न समाजपर न हीधर्म प्रचार पर बेहिसाब मोडे  पेट फुलाए पडे शंकराचार्य   जो धर्म प्रचार नही करते जबकि विव्देसो मिसनरी ईसाई बना रही हैं   सरकार का मुसलमानो को बढावा जातिवाद की कटरता ऊंची जात वालो द्वारा एस सी उत्पीडन   वसुधैव कुटुम्ब की धारणा हिन्दू नेताओ की गदारी समाज के ठेकेदारो का असहयोग  छुआछात  लगातार आंख बन्द कर एक पार्टी को वोट  चारो ओर से हिन्दुओ पर हमला सिक्ख ईसाई मुसलमान बौध्द सभी हिन्दओ से, हिन्दू गरंथो  मे व्यवहार हीन बाते  ईलाज  है  पर कोई मानेगा नही सिर्फ तीन  कदम पहला धार्मिक छूत बन्द दूसरावोट देने से पहले नेताओ से गारन्टी तीसरा चढावा समाज पर खर्च मोडे धर्म गुरू पुजारीसैकुलरो का बहिष्कार करो जोधर्म प्रचार करे उसी को मान्यता 

के द्वारा: snsharmaji snsharmaji

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

आदरणीय दिनेश जी, अक्रक्ताले जी ने अपनी प्रतिक्रिया में तीन महत्वपूर्ण बाते लिखी है जिनका जवाब देना मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूँ- एक बात इन्होने लिखी की आज भी कुंडलियों को शादी और अन्य कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है, क्या जितने भी लोग शादी की लिए कुंडलियों का मिलान करवा लेते हैं शादी के बाद उनके घरों में, शादीशुदा जिंदगी में कोई दिक्कत नहीं आती है, क्या उनमे पति या पत्नी में से कभी किसी की जल्दी मृत्यु नहीं होती है, क्या उनके समस्त बच्चे हष्ट-pusht तंदरुस्त ही होते है और क्या जो लोग कुंडलियों का मिलान नहीं करवाते वे पूरी जिंदगी साथ में एक सामान्य शादीशुदा जीवन नहीं बिता पाते? (मेरे कई मित्रों की शादी कुंडलियों के मिलान के बाद हुयी और कुछ की बिना मिलान के लेकिन दुःख-सुख तो dono घरों में लगभग वैसा ही है, कुंडलियों के मिलान करवाने वाले कुछ घरों के बेटे-बहु माँ-बाप से झगडा करके अलग रहने लगे हैं! एक की तो स्थिति बहुत ज्यादा ही खराब हो चुकी है पूरे समाज में देखेंगे तो आज कल तो हर दुसरे घर में शादी के कलह मची रहती है जबकि आज भी ज़्यादातर लोग कुंडली मिलान करवाते है, फिर कुंडली मिलान का क्या औचित्य?) दूसरी बात अगर यह ज्योतिष शाश्त्र मिथ्या होता तो कब का हम इसे भूल चुके होते, क्या वाकई जितनी भी मिथ्या चीज़े- रिवाज़ समाज में मिथ्या थे उन्हें हम भुला चुके है? अब समाज में व्याप्त धर्म-जाती आदि को ही ले लीजिये, इस मिथ्या चीज़ को तो हम अपने नाम से चिपकाए घुमते हैं जबकि समस्त पढ़ा-लिखा वर्ग जानता है की मानव सभ्यता- आदि मानवों से शुरू हुयी थी फिर धीरे दीरे उसका विकास हुआ बाद में अलग-अलग कबीले बने फिर समाज बना उसके बाद ये धर्म-जाती की उत्त्पत्ति की गयी...अब आज के समय में इन मिथ्या चीज़ों को भी तो स्वार्थी राजनीति और समाज के कुछ तथाकथित उच्चा वर्गों की साजिश की वजह से नहीं मिटने दिया जा रहा है! उसी तरह यह ज्योतिष है..स्वार्थियों ने इसे पाल रक्खा है ...जनता का क्या है जब धर्म-जाती के नाम पर भड़क जाती है, उसी तरह राहू-केतु से भी डरती रहती है ! भूत जिसका अर्थ ही होता है जो बीत चूका है...उससे भी डरती रहती है बेचारी जनता, मंदिरों और बाबाओं को अरबपति बनाकर गरीब होने वाली हमारी आम जनता ! तीसरी बात ये पंचांग वगैरह कभी गलत साबित नहीं हुए, तब तो हमारी मानव सभ्यता और पृथ्वी कबकी ख़त्म हो चुकी होती क्योंकि इन्ही के आधार पर पहले भी कई बार इसके नष्ट होने की भविष्यवाणी हो चुकी है...अगली भविष्यवाणी 21 दिसंबर 2012 की है....जो ज्यादा दूर नहीं है

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अशोकभाई, दिनेशभाई नमस्कार आदमी ने एक समय रेखा बनाई है । और ज्योतिष भी ईस के आधार पर ही चलता है । भूत-------------------------वर्तमान----------------------------भविष्य भूतकाल की रेखा ईतनी लंबी है की कुदरत भी ईस के दायरे में आ जाता है । ईस रेखा के कोइ ना कोइ एक बिंदु पर उस का जनम हुआ होगा, उस ने ब्रह्मांड की रचना की होगी । ईस रेखा को अंकित भी किया जाता है ईतिहास के पन्नों में, आदमी की यादों में । वर्तमान तो है ही नही । एक सेकंड पिछे जाते हो तो भुतकाल हो जाता है, एक सेकंड आगे जाओ तो भविष्य हो जाता है । भविष्य की रेखा भी अनंत तक जाती है । कुदरत भी ईस के एक बिंदु पर मर जायेगा । मेरी समय रेखा रोकेट या मिसाईल जैसी है, जीसमें भविष्य रेखा एक बिंदु ही है, शरुआती बिंदु । रोकेट चलता है अनजाने भविष्य की ओर, भविष्य के प्रथम बिंदु का स्पर्ष करते ही रोकेट खूद एक नेनो सेकंड के लिये वर्तमान बन जाता है फिर भूतकाल धुआं छोड देता है और धुआं ही धुआं दिखता । ज्योतिष ईस धुएं से कुछ चीज खोज लेते हैं, जीस के आधार पर अंदाजा लगाते हैं की रोकेट किस दिशामें जाएगा । और आगे का रास्ता क्या हो सकता है । ब्रह्मांड चलता है घटनाओं की घटमाल से । एक घटना के जवाब में दुसरी घटना घटती है । कुदरत ने आगे से कोइ प्रोग्राम नही बनाया है की ऐसी ऐसी घटनाओं को घटना है । सब अपने आप होता है । कोइ गेरंटी नही अगली सेकंड क्या होगा । केलेंडर, पांचांग सिधा साधा खगोल का गणित है । भविष्यवाणी भुतकाल की घटनाओं से सबक ले के लगाया गया अनुमान है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय दीप्ति जी, सादर नमस्कार। यह सच है कि ज्योतिष एक गणित, अंक एवं बीजशास्त्र तो है, किन्तु यह फल विद्या कदापि नहीं है। जहाँ तक कुण्डली आदि का सवाल है, स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इस संबंध में अपनी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में बहुत ही विस्तार से लिखा है। अनेक प्रश्न भी उठाये हैं जिसका उत्तर आज तक किसीने भी नहीं दिया। इसी संबंध में मैंने अशोक जी की प्रतिक्रिया के उत्तर में थोड़ा विस्तार से लिखा है। मेरा मानना है कि जिसे हम भाग्य कहते हैं, वस्तुतः वह परिस्थितियाँ होतीं हैं। हमें बिना कर्म के कुछ प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि हमें बिना कर्म के कुछ प्राप्त भी होता है तो मैं उसका उपयोग करना पाप समझता हूँ। उसका तो असली मालिक वह है जिसने उसको प्राप्त करने के लिये प्रयत्न किया है। यदि हम उसका उपयोग करते हैं तो एक तरह से दूसरे के हक को छीन रहे हैं। यह मेरी व्यक्तिगत मान्यता है। अतः भाग्य का मुझे कुछ भी स्वीकार नहीं है। मैं जानता हूँ कि मेरे विचारों से सामान्यतः किसी का सहमत होना संभव नहीं है। यहाँ तक कि मेरे परिवार का भी, किन्तु फिर भी मैं अपने विचारों पर अटल हूँ। आपकी कुछ बातों से असहमत होने के लिये आपका क्षमा प्रार्थी हूँ। आलेख को पढ़ने एवं सामालोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार.....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय अशोक जी, सादर नमस्कार। सत्य है कि ज्योतिष में रेखा गणित, बीज गणित तथा अंक गणित आवश्य है। हाँ फल विद्या का इससे कोई संबंध नहीं है।मैंने यह आलेख स्वामी दयानन्द की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में उद्धत उनके विचारों को आधारबनाकर लिखा है। इसमें मेरा अपना कोई भी मौलिक विचार नहीं है। इस संबंध मे स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने आपनी पुस्तक में बहुत ही विस्तार से सप्रमाण एवं तार्किक ढंग से लिखा है। संभवतः इसे पढ़ने से आपका शंका का समाधान हो जायगा। स्वामी जी ने इन पाखंडियों के विरूद्ध एक अभियान से चला रखा था। इसी कारण से इन पाखंडियों ने अपने कुचक्रों द्वारा इस उनकी हत्या करा दी। और एक झूठी कहानी गढ़ दी। इस साजिश में अंग्रेज सरकार का भी अप्रयत्क्ष हाथ था। क्योकि उन्होंने बाइविल पर भी बहुत से आक्षेप किये थे। उनके द्वारा कुरान पर उठाये गये प्रश्नों के उत्तर तो आज तक नहीं मिले। उन्होंने कुंडरियों के संबंध मे भी कई सवाल उठायें हैं। रचना को पढ़ने एवं समालोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

दिनेश जी सादर, सबको एक लकड़ी से हांक देना ठीक नहीं है. ठीक है आप ढोंगी लोगों से जनता को आगाह करना चाहते हैं बहुत अच्छी बात है. किन्तु ज्योतिष शास्त्र पर टीका कर सकें क्या इतनी काबिलियत हैं भी आप में. इस पर विचार अवश्य ही करें. इस ज्योतिष शास्त्र के भरोसे ही पूरा पंचांग बनता है और ये कभी गलत साबित नहीं हुआ है.ज्योतिष के आधार पर बनायी गयी कुंडलियों को आज भी शादी के लिए या अन्य कार्यों के लिए प्रयोग किया जाता है क्यों. यदि यह पूर्ण मिथ्या होता तो कब का हम इसे भूल चुके होते. हाँ अपनी उदरपूर्ति कि समस्याओं के कारण इसके बड़े जानकार अब नहीं के सामान ही रह गये हैं और कई अपूर्ण ज्ञान वालों ने इसे अपने उदरपूर्ति का साधन बना लिया है. किन्तु इससे शास्त्र खोटा नहीं हो जाता.

के द्वारा: akraktale akraktale

हाथ जोड़कर नमस्कार दिनेशजी, बहुत ही सुन्दर रचना, विषमताओं पर आघात करती हुई वास्तव में पसंद आई. राजकमल जी की विरोधी प्रतिक्रियाओं का आपने बड़ी सहजता से उत्तर दिया,ये आपकी सहनशीलता को दर्शाता है, क्यूंकि सभी के विचार भिन्न भिन्न होते हैं तब असहमति जताने वाले अर्थात विरोधी भी अवश्य होंगे , राजकमल जी से प्रार्थना करना चाहूंगी कि लेख को लेख तरह ही पढ़े व् समझे. तथा कृपया मंच को तो कम से कम धर्मविहीन रहने दें. दिनेशजी ने न ही भगवन में,नहीं भगवन के कार्यों में मीन मेख निकला है, उन्होंने तो कविता के दुआरा भगवन को स्मरण कराया है कि तेरी बनायीं गयी विषमताएं अब सहनशीलता से परे होने लगी हैं.और हाँ महान तो कोई नहीं होता जी महान तो विचार हुआ करते हैं..महान विचारों के कारन दुसरे लोग उन्हें महान की उपाधि दे देते है. जब तक विचार महान नहीं होंगे कोई कैसे महान हो सकता है.? जब हम पीड़ितों को दयानिये स्थिति में देखकर भी कुछ कर नहीं पाते तब वास्तव में हृदये दुखता है,रोता है,बिलखता है, और यही दुःख दिनेशजी की रचना में महसूस किया जा सकता है, आप भी समझने की कोशिश करेंगे तो वास्तव में आपके पास कोई शिकायत नहीं रहेगी राजकमल जी. धन्यवाद. कोई बात बुरी लगी हो तो माफ़ करें...

के द्वारा: amanatein amanatein

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

अमानत जी, आपका ईमेल प्राप्त हुआ, निश्चित ही आपसे शीघ्र संपर्क साधूगा। संगठन का विचार मेरे मन में भी है। इस संबंध में कुछ लोगों से संपर्क में भी हूँ। मैं दिल्ली में रहता हूँ, आप कहाँ रहतीं तथा आपका कार्य क्षेत्र क्या है। इसी आधार पर आगे की भूमिका स्थापित की जा सकती है। हमें समान विचारधारा के लोगों को संगठित करना है। हमारा संगठन निश्चित ही परिवर्तन की पहल करेगा। कृपया हाथ मत जोडा कीजिये। यदि हमारे विचार वास्तव में मिलते हैं तो हम सब बराबर हैं। कोई छोटा बड़ा नहीं है। फिर आपने कोई त्रुटि तो नहीं की तो हाथ जोड़े। बुरा ना माने, आपको मित्र मानकर सलाह दे रहा था। यदि सलाह में कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें। रचना को पढ़ने, पसंद करने एवं उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार……

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

जिनके पास न रोटी है . न वस्त्र , न शिक्षा है , न छत , उनसे क्या पूछिए , क्या है स्वतन्त्रता दिवस , स्वतंत्रता दिवस तो मनमोहन को लिखा है , जो लालकिले पर तिरंगा फहराएंगे या कि प्रणव मुखर्जी जिनकी लाटरी लगी है ........... पिंजड़े में बंद परिंदों को वास्ता क्या ? इन झमेलों से, चमन में कब खिजां आई , चमन में कब बहार आई। भूखे प्यासे , शोषितों को जिनक ी मिहनत - मजदूरी के पैसे . लूट लिए पटवारी ने , वे बेचारे , जनतंत्र -तिरंगा क्या जानें ? बोलने की ही नहीं जीने और भूखे न मरने की भी आजादी होनी चाहिए , झंडे लहराने और लाल किले से लफ्फाजी करने से आजादी का कोई अर्थ नहीं -----अहलुवालिया के टायलेट में तीस लाख का टाइल और दूसरे भारतीय को तीस रूपये रोज पर मर मर के जीती जिन्दगी , क्या हमे शर्म नहीं आती इस आजादी के जश्न पर .....पूरी आजादी चाहिए .....पूरी आजादी मुबारक हो .....जबतक भ्रष्ट नेताओं /अफसरों को जेलों में न डाला जाय , आजादी नहीं, हम इन नेताओं और अपनी ही कायरता के गुलाम हैं ,,,,,

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

के द्वारा: tejwanig tejwanig

हाथ जोड़कर नमस्कार दिनेशजी, इश्वर पर लिखी आपकी उस कविता ने ही मुझे आपका फैन बना दिया था और आपके लेख पढने के लिए उत्सुक किया था, और अज ये रचना पढ़कर तो मैं यही कहूँगी की अपने मेरी भावनाओं को इस रचना में पिरो दिया है. मैं पूर्णतया सहमत हूँ, की सच्चे प्यार के लिए मिटा दो खुद को ,बर्बाद कर दो खुद को. हाँ ९५% ये हो सकता है की बदले में आपको धोका मिले या आपको आपका प्यार न मिले, लेकिन एक सच ये भी है की वो धोखा देने वाला एक दिन जीवन में पछतायेगा, अवश्य आपके लिए एक बार तडपेगा, और चाहेगा की दीवाना बनकर एक बार फना हो जाये आपके लिए,सिर्फ आपके लिए. दिनेश जी की जितनी भी तारीफ करूँ कम हैं, इस प्यारी सी रचना के लिए ही नहीं..उन रचनाओं के लिए भी जिन्हें मैंने पढ़ा नहीं लेकिन फिर भी उनकी योग्येता ने महसूस करा दिया है की बाकी रचनाएँ भी एक से बढ़कर एक होंगी... अपनी एक अदना सी फेन का धन्येवाद स्वीकार करें सर...जल्दी ही आपकी बाकी रचनाएँ पढने को उत्सुक हूँ..आपकी आज्ञाकारी...अमानत.

के द्वारा: amanatein amanatein

के द्वारा: tejwanig tejwanig

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

आदरणीय अशोक जी, सादर नमस्कार। यह मेरे अपने विचार नहीं है बल्कि कुछ पुस्तकों के अंश हैं। इन पुस्तकों में कहीं कहीं समय नहीं दिया गया है। किन्तु राजाओं का नाम होने के कारण समय का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस आलेख को लिखने का मकसद असम के प्रति हमारी उदासीनता को दूर करना है। असम को कश्मीर बनने से रोकने के लिये प्ररित करना है। कल ही एक जम्मू कश्मीर के बुजुर्ग हिन्दु व्यक्ति से मुलाकात हो गई, जब मैंने उसे इस बारे में चर्चा की तो उसने भी कहाँ, हाँ मैंने भी अपने बुजुर्गों से ऐसा ही कुछ सुना था। उसने यह भी कहा कि कश्मीर में उत्पात पाकिस्तान से आये हुये लोग ही उत्पात मजाते हैं, यहाँ के मूल निवासी तो वर्तमान समय में बहुत ही अच्छी तरह से रह रहें है। लेकिन वह महाशय कश्मीर से नहीं अपितु जम्मू से थे। इतिहास क्या है यह तो गहन अध्ययन करके ही पता चल सकता है। लेकिन इस्लामी शासन के आगमन का इतिहास तो कुछ न कुछ होगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

भरोदिया जी सादर नमस्कार। इनके पास इतना अधिक पावर एवं पैसा है कि इनके कुचक्रो को आम आदमी के लिये समझ पाना बहुत मुश्किल है। ये लोग उस हिन्दु को अपराधी भी साबित कर देंगे। तथा उसे अपराध स्वीकारने पर विवश भी कर देंगे। मेरा तो मानना है कि अन्ना के आन्दोलन को विफल करने के लिये ही आसाम का सुनियोजित दंगा करवाया गया, माया की मूर्ति तोड़ी गई, भारत में ब्लैक आउट किया गया और अंत में पूणे में नकली बंब ब्लास्ट किया गया। संभवतः यही सब समझते हुये अन्ना टीम में अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में आने के संकेत दे दिये हैं। कोई भी सच्चा हिन्दु आतंकवादी नहीं हो सकता। आलेख को पढ़ने, सराहना करने एवं प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार…

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

सतीश जी हमें कुछ ऐसे संस्कार मिले हैं कि हम केवल आँखे खोलकर देख सकते हैं। अपनी दुर्दशा् पर आँखू बहा सकते हैं, कर कुछ नहीं करते। यही हमारी गुलामी एवं बरवादी का कारण बना। इस्लाम और क्रिसचन सभ्यतायें हमसे बहुत बाद में आई, लेकिन आज उनका विश्व पर अधिपत्य एवं आतंक सा है। अब हमें अपनी कुछ कमियों को त्यागना होगा, तभी हमारी अगली पीड़ियाँ सम्मान पूर्वक जी सकेंगी। हमारी सहिष्णुता, अहिंसक एवं अतिथि को ईश्वर का दर्जी देने की नीति ही हमारी कमजोरी है। असम में भी हमारी पूर्व की कमियों का लाभ उठाकर हथियाया जा रहा है। भ्रष्ट नेता सत्ता पर काविज होने के स्वार्थ के कारण एक और कश्मीर का निर्माण करने भारत को फिर से विभाजन के लिये तैयार कर रहे हैं। प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

दिनेश जी बहुत दुःख होता...बहुत गुस्सा आता है और आश्चर्य भी होता है की भारतीय सभ्यता के इतना विकास कर लेने के बाद भी आज भी भारत में वैसे ही जाती-धर्म आधारित दंगे हो रहे हैं जैसे-सैकड़ों साल पहले होते थे निश्चित ही यह सब घटिया राजनीति का षड़यंत्र है... क्योंकि आज प्रत्येक दल का अपना-अपना एक निश्चित समुदाय है जो उसका सदैव समर्थन करता है (सिर्फ कुछ बिद्धिजिवी लोग ही ऐसे हैं जो प्रत्याशी और उसकी घोषणापत्र में वर्णित प्राथमिकताओं को देखकर वोट करते हैं.... हालांकि वह भी बेकार ही है क्योंकि जीतने के बाद तो ज़्यादातर वादे झूठे ही निकलते हैं) और ऐसे समुदायों के ह्रदय में सभी के सामान होने और भाईचारे की भावना यदि आ गयी तो ऐसे राजनीतिक दलों का निश्चित वोट बैंक खतरे में पड़ जाएगा....इसलिए जानबूझकर ऐसे दंगो को फैलाया जाता है....कश्मीर हो, गुजरात हो या फिर अब ये आसाम हो.....और पिछले कुछ हफ़्तों में उत्तर प्रदेश में होने वाली कई घटनाएं बहुत ही शर्मनाक हैं आपके और मेरे जैसे अन्य लोगों द्वारा इस विषय पर बार-बार लिखा जाना लोगों का समर्थन मिलना सब जारी है..किन्तु फिर भी ये दंगे जारी हैं...हम सभी राजनीतिक षड्यंत्रों से पीड़ित हैं....

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

दिनेश जी जब आप किसी की बेसिर पैर की आलोचना करते है तो उसको तर्क के लबादे में छिपाने की ओछी कोशिश करते है ..... लेकिन जब आपसे कोई प्रश्न पूछा जाता है तो आप उसका उत्तर देने की बजाय *उसको व्यक्तिगत बात मानते है , जबकि आपकी बातो को व्यक्तिगत ना लिया जाए यह आपकी कुचेषता भरा आग्रह रहता है *उसकी बजाय आप प्रश्न पूछने वाले पर अर्नगर्ल आरोप लगाने लगते है , इससे सिद्द होता है की आप तर्क करने में नहीं बल्कि कुर्तको में विश्वाश रखते है (मेरा सवाल अब भी वोही है की भगवान श्री कृष्ण जी के कौन से कार्य आपको अक्षम्य लगते है ?...... अगर मेरे इस प्रश्न से इस मंच पर पकिस्तान का निर्माण होता है तो मुझको हार्दिक खुशी होगी)

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय राजकमल जी, सादर प्रणाम, आपका उद्देश्य मेरी समझ से परे है। जिस प्रश्न या उत्तर को आप खोज रहे थे वह तो आपकी अवचेतन अवस्था् में भी होगा। जबकि वह मेरी चेतन अवस्था में होगा। जिस बात को आप पकड़ने के लिये भाग रहे हो वह तो मेरी अधिकांश रचनाओं में विद्यमान हैं। मान्यवर जो है उसे खोजिये जो नहीं है उसे खोजने से क्या लाभ। हमारी कोशिश यह होनी चाहिये कि सत्य क्या है न कि यह की जो हम कह रहे हैं या सोच रहे हैं या लिख रहें हैं वही अंतिम सत्य है। और सभी को उसे ही आस्था के आधार पर स्वीकार करना चाहिये। जहाँ आस्था है, वहाँ बुद्धि नहीं रहती है और जहाँ बुद्धि रहती है वहाँ आस्था नहीं रहती। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि आप किसी बात को केवल इसलिये स्वीकार न कीजिये कि वह हमारे धर्म ग्रन्थ में लिखी है या हमारे किसी सम्माननीय व्यक्ति ने कही है, अपितु स्वयं मनन चिन्तन कीजिये और यदि आपको तार्किक लगे तो स्वीकार कीजिये अन्यथा नहीं। मैं फिर कहता हूँ मैं किसी व्यक्ति या संस्था का विरोधी नहीं हूँ, अपितु विचारों का विरोधी हूँ। इस तरह के विचारों से ही पाकिस्तान का जन्म हुआ। कृपया लोगों की भावनायें भड़काकर मंच पर पाकिस्तान का निर्माण मत कीजिये। मैं इस मंच को ग्रुप विहीन देखना चाहता हूँ, कृपया इसमें मेरी मदद कीजिये। सच क्या है, इस संबंध में मेरा मार्गदर्शन कीजिये। मैं कोई भी प्रतिक्रिया किसी को आहत करने के लिये नहीं लिखता और न ही आपनी आलोचना से आहत होता हूँ। कृपया आप भी ऐसा ही करें। आपका आभार व्यक्त करूँगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

मैं भी कृष्ण को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ कृत्य मानवीय दृष्टि से क्षम्य नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक कारणों से अपने विचारों पर अटल हूँ। Dinesh जी .... सादर अभिवादन ! उपर्लिखित आपके ही शब्द है या फिर आप इनसे मुकरते है मैंने आपसे एक सीधी सी बात पूछी थी की आपके “भगवान श्री कृष्ण जी” के बारे में क्या विचार है आप उनका खुलासा करने की बजाय दूसरी बातो में उलझाने में लगे है मेरे समेत बाकी के ब्लागरो को भी आखिरकार आपके असली विचार तो पता लगने ही चाहिए (कई दिनों की मेहनत से आपके पवित्र सद विचार को खोज पाया हूँ ) सच में ही जिस दिन से आपकी यह प्रतिकिर्या पढ़ी थी उसी दिन से ही आपसे मन उचाट हो गया था और अगले ही दिन मैंने अपना विरोध जतला दिया था इसमें व्यक्तिगत जैसी कोई बात नहीं है आप अपने ब्लॉग पर मेरी बात को(विरोध को ) चैक कर सकते है जब हम पड़ोसी के घर में आग लगाते है तो भूल जाते है की हमारी दिवार सांझी है ..... :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय राजकमल जी, संभवतः आप मेरी समालोचनात्मक प्रतिक्रिया से आहत हुये हैं। मैंने आपको आहत करने के उद्देश्य से प्रतिक्रिया नहीं दी थी। आपके आहत होने का मुझे खेद है। विचार है तो सनातन है। किसी व्यक्ति विशेष के नहीं हो सकते, हाँ हम उसके समर्थक या आलोचक मात्र हो सकते हैं। यह मेरा भ्रम है कि वह विचार हमारा मौलिक विचार है। ऐसा मेरा मानना है। संभवतः यह मेरा भ्रम भी हो सकता है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि विचार हमारी पहचान है और अपनी पहचान से कोई कैसे डर सकता है। हाँ जो भ्रमित हो, जिसकी सोच अंध विश्वास पर आधारित हो, जो केवल आस्थाओॆ में विश्वास रखता हो। बुद्धि को नकारता हो, व्यक्तिवादी सोच को मान्यता देकर व्यक्तिपूजा में विश्वास करके पूँजीवाद का समर्थक हो, वही अपने आप से एवं अपनी सोच से डरता है। मैं किसी व्यक्ति, संस्था या धर्म को विरोधी नहीं हूँ और न ही ईश्वर का, अपितु असत्य का विरोधी हूँ। मैं न तो किसी का समर्थक हूँ और न ही विरोधी। यहाँ तक कि आज अपने द्वारा कहे गई उस बात या विचार का, कल गलत सावित हो जाने पर विरोध करता हूँ। और मुझे ऐसा करने में न तो कोई हिचक होती है और न ही ग्लानि। बल्कि खुशी होती है कि मैं आज सही हूँ कल की अपेक्षा। आस्तिक आया मंच पर, करने को भई सैर। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।। कृपया मेरी प्रतिक्रियाओं को सकारात्मक रूप में लिया करें, व्यक्तिगत नहीं। प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

आदरणीय सीमा जी सादर नमस्कार। मेरा मानना है कि सभी धार्मिक पुस्तकें मानवकृत हैं। सभी धार्मिक पुस्तकों में बहुत ही सुन्दर सुन्दर बातें लिखीं हैं। इन्हीं पुस्तकों ने हमें जंगली मनुष्य से सभ्य मानव बनाया। मैं इन पुस्तकों को अपने संविधान की तरह देखता हूँ। आज के परिवेश में इनमें कुछ कमियाँ हैं। क्योंकि वे प्रचीन काल की परिस्थितियों के हिसाब से लिखीं गईं थीं। एक आदरणीय ब्लॉगर मंच पर हिन्दु धर्म को आरोपित करके आलेख लिख रहे थे। ब्लॉगस्पॉट पर उनके आलेख पढ़े जिसमें उन्होंने हिन्दु धर्म पर कई प्रश्न खड़ किये। मैंने वहाँ अपनी तार्किक प्रतिक्रिया भी दी जिसे उन्होंने वहाँ पब्लिश नहीं किया। मेरी यह रचना एक तरह का उनके आलेखों को जवाब है तथा मेरा उद्देश किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है अपितु सत्य को जानना है। लेकिन यह मेरा है कि किसी ने मेरे पश्नों का उत्तर नहीं दिया। आपकी समालोचनात्मक प्रतिक्रिया के लिये हृदय से आभार.....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

दिनेश जी सादर नमस्कार मेरे विचार से तो कोई भी धर्म बुरी बातों को नहीं सिखाता .किसी भी धार्मिक ग्रन्थ में गलत बातें नहीं लिखी होती फिर किस पुस्तक में कत्ल की बात लिखी होगी .कौन भगवान ,खुदा अन्यायी ,झूठा होगा .हर धर्म प्रेम ,दया ,मानवता ,भलाई ही सिखाता है .सारे धर्मों का सार मानवता ही है बस पूजा विधि और नाम अलग है .गाँधी जी ने कहा है ....धर्म माता के समान होता है ,हमें माता का अपमान नहीं करना चाहिय ,चाहे वो दुसरे की ही माता क्यों न हो ,.....किसी शायर ने कहा है ... हाफिज़ गर वसले ख्वाही सुल्ह्कुन -ओ -खास -ओ -आम बा मुसलमा अल्ला -अल्ला ,वा ब्रह्मन राम -राम .. अर्थात अगर चैन ,सुकून से रहना चाहते हो तो मुस्लिम को अल्लाह -अल्लाह और हिदू को राम -राम करने दो . वैसे भी ..............राम कहो रहमान कहो या कहो अल्लाह .......................सबका खेवनहार है वही एक मल्लाह

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

adarniy dinesh ji namskar, अत्यधिक व्यस्तता के कारण आपकी यह पोस्ट कई खण्डों में पढ़ी.. कुरान शरीफ के बारे में कहा जाता है की इस पुस्तक में एक नुक्ते तक की कमी नहीं है अर्थात यह अपने आप में सम्पूर्ण है..अब अगर साढ़े चौदह सौ साल पहले लिखी गयी इस पुस्तक के भावार्थ को आज तक कोई समझ न सका तो इस में पुस्तक के उपदेशों और रचयिता की क्या कमी है? गीता , कुरान और बाइबिल को यदि ध्यान पूर्वक पढ़ा जाये तो कहीं भी यह नहीं लिखा है की सिर्फ अपने संप्रदाय वालों से प्रेम और दूसरों से नफरत करो या मारो काटो... देश, काल ,परिस्थिति के आधार पर यदि कोई बात कही जाती है तो उसे आंख मूंद कर बिना सोचे समझे मानने वाले लकीर के फकीर और बेवकूफ कहलाते हैं.क्यूँ की ये बातें उस काल के जाहिल कबीलों को समझाने के लिए सरल भाषा में कही गयी थीं.... उन बातों की आड़ लेकर हिंसा व दंगे , उन्माद करने वाले वास्तव में इस्लाम के दुश्मन हैं जो इस्लाम का ABC समझे बिना सिर्फ अपना फ्रस्ट्रेशन मिटा रहे हैं और इस्लाम जैसे महान धर्म का नाम मिटाने में लगे हैं...

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीय सचिन जी, नमस्कार। मेरे यह आरोप वास्तविक ईश्वर के प्रति नहीं है। उस तथा कथित पुस्तक के लिये है जिसको आधार बनाकर कुछ महान ब्लॉगर हिन्दु धर्म में नशा, संयास आश्रम आदि का आरोप लगा रहे थे। मेंने उनको लिखा भी था, आपको जो बीमारी है आप उसका इलाज कीजिये अपनी बीमारी को छोड़कर हमारी बीमारी का इलाज करने का प्रयास न कीजिये। हम सक्षम हैं अपना इलाज करने में। हमने पहले किया भी है। सति प्रथा जैसी बीमारी को जड़ से खत्म किया है। आप उस महान धार्मिक पुस्तक को रख कर इन दोहो का आनन्द लीजिये और फैसला कीजिये कि क्या मैंने प्रश्न आधारहीन एवं अतार्किक हैं। समर्थन करने एवं प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये हृदय से आभार......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

प्रितीश जी, मेरे यह आरोप वास्तविक ईश्वर के प्रति नहीं है। उस तथा कथित पुस्तक के लिये है जिसको आधार बनाकर कुछ महान ब्लॉगर हिन्दु धर्म में नशा, संयास आश्रम आदि का आरोप लगा रहे थे। मेंने उनको लिखा भी था, आपको जो बीमारी है आप उसका इलाज कीजिये अपनी बीमारी को छोड़कर हमारी बीमारी का इलाज करने का प्रयास न कीजिये। हम सक्षम हैं अपना इलाज करने में। हमने पहले किया भी है। सति प्रथा जैसी बीमारी को जड़ से खत्म किया है। आप उस महान धार्मिक पुस्तक को रख कर इन दोहो का आनन्द लीजिये और फैसला कीजिये कि क्या मैंने प्रश्न आधारहीन एवं अतार्किक हैं। समालोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आभार......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

dineshjee,इस लेख के पीछे जो भावना है वह यह की धर्म को वैमनस्य फ़ैलाने के रूप में बढ़ावा ना दिया जाए. सच कहूँ तो जो परम शक्ति पर भरोसा करता है वह कभी भी गलत आचरण नहीं रखता यहाँ तक की ऐसी बातों का ख्याल आने पर ही एक कल्पित छवि(इष्ट)का ध्यान उसे सन्मार्ग की ओरे ले जाने लगती है .संसार में धर्म के naam पर अन्याय करने वालों ने कभी भी इस पवित्र शब्द के असली अर्थ को नहीं समझा.धर्म मुलभुत नैतिक प्रतिमान है जिसको धारण करने से हम अछे-बुरे के श्वेत-श्याम रंगों में हमेशा अच्छाई का श्वेत रंग चुन पाते हैं यकीन करिए ऐसे ही लोग तन-मन-धन से सुखी और संतुष्ट रहते हैं मन में अछे विचारों से तन भी स्वस्थ रहता है और अत्यधिक धन की लालसा उन्हें कभी होती ही नहीं वे जानते हैं की कितना भी सोना-चांदी रख लो क्षुधा पूर्ति के लिए गेहूं की चार रोटियाँ ही खाई जाएँगी सोने की रोटियाँ कहीं नहीं बनाती. एक बात और हवा तो किसी ने नहीं देखा फिर पतियों के सरसराने से ही मान बैठे की हवा है;संगीत किसी ने नहीं देखा पर गाने वाले के हाव-भाव और सुरों को सुनकर जाना की संगीत है,तो फिर हमारा इस धरती पर होना हमारा सृजन ही उस सर्जक की सर्वव्यापक होने का प्रमाण नहीं है क्या? उदाहरण देखिये एक रेल दुर्घटना होती है तो सभी एक साथ क्यों नहीं मर जाते?कुछ घायल होते हैं;कुछ सही-सलामत बच जाते हैं और कुछ सदा के लिए मृत्यु के आगोश में चले जाते हैं .किस विज्ञान की कौन सी theory इसकी सही सटीक तर्क सहित व्याख्या कर सकती है.गर्भ में शिशु पलता है कौन सी शक्ति है जो उसका पल-पल विकास करती रहती है. जोडियाँ स्वर्ग में नहीं बनतीयह बात है तो सात समुन्दर पार से भी रिश्ते कैसे बन जाते हैं जब की आस-पड़ोस में ही अपनी जात-बिरादरी के सकदों लोग रहते हैं और फिर सभी की शादी अपने ही जात बिरादरी में क्यों नहीं हो पाती?किसका विधान है यह सब?कौन चित्रकार है कौन शिल्पकार है ???????????????

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: shailesh001 shailesh001

भाई दिनेश जी यह तो आपके उपनाम से सिद्ध होता है की आप आस्तिक है फिर व्यवहार में नास्तिकों जैसा कर्म क्यों - इश्वर है था और रहेगा भी न तो वह अन्यायी, न अत्याचारी, न हत्यारा, न झूठा, न छली, न अल्पज्ञ, न भुलक्कड़, न पक्षपाती, न अभिमानी, न पापी, है और न ही अपराधी तथा न ही जादूगर है। वह तो सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान, व्यापक और नियम का पक्का है भी है । अगर नियम का पक्का न होता होता तो यह संसार चलता ही नहीं - इसलिए इश्वर की ख़ोज पुस्तकों में न करें व्यहार में और अनुभव से इश्वर की ख़ोज करे तो सफलता अवश्य मिलेगी एइसा मेरा विश्वाश है और मैं गारंटी सहित कहता हूँ की आप अगर मन को एकाग्र करके इश्वर की आराधना करे तो वह आपको अवश्य ही मिलेगा ? धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

जहाँ तक मेरी अपनी सोंच कहती है कि खुदा, ईश्वर को हमने अपने मतलब के लिए गढा है, हमें एक ऐसे वस्तु कि तलाश थे जो वास्तव में अलोकिक गुणों से परिपूर्ण हो ........पर इस युग में ये संभव नहीं है, ईश्वर या खुदा सिर्फ इस लिए ईश्वर या खुदा है क्योंकि वो इंसानों कि तरह किसी से किसी कि चुगली नहीं करता, वह सदैव मौन रहता है, न वह यह कहता है मैं किसी का कोई काम बनाउगा न बिगाड़ूगा बस यही गुण एक पत्थर को भगवान बनाने के लिए काफी है! जैसा कि मैं देख रहा हूँ पिछले १० -१२ वर्षों से इंसान कि मानसिकता का ह्रास हुआ है और ईश्वर कि स्तुति में इजाफ़ा ...........जिसका कारण बिलकुल सही सही दिया है : पाप करो पाओ क्षमा, बढ़ेंगे निश्चित पाप। न्यायी कैसे बन गये, अरे खुदा जी आप।। पहिले भारी पाप कर, फिर ले माफी माँग। धर्म ग्रन्थ में है लिखा, खुदा करेगा माफ।

के द्वारा: avermaaa avermaaa

आदरणीय राजकमल जी सादर नमस्कार...... बोलो राजकमल जी जो भी, कर सकता हूँ मैं स्वीकर। किन्तु सविनय एक निवेदन, बतलायें उसका आधार। मेरे प्रश्नों का उत्तर गर मिलता अधिक खुशी होती; शंकायें हल यदि करें तो, मानूँगा दिल से उपकार। धर्म जाति में जिसने बाँटा जिसके कारण हुये गुलाम; ईश्वर बिन हम ज्यादा अच्छे, तर्काधारित सही विचार। धर्म जाति पर कितनी हिंसा, मंदिर मस्जिद हैं तोड़े; शत प्रतिशत इसमें सच्चाई, ईश्वर इसका जिम्मेदार। मैं भी बड़ा नास्तिक पहले, अंधी भक्ति रखता था; आज समझ आया है मुझको, वक्त बिताया था बेकार। समझ नहीं आता है मुझको, बुद्धि हमारे पास बहुत; किन्तु आस्था के सम्मुख क्यों बुद्धि जाती है यह हार। संविधान हो धर्म ग्रंथ बस, न्यायालय मंदिर मस्जिद; जाति भारतियता हो सबकी, मानव धर्म करें स्वीकार। मानवता पहचान हमारी, कोई नहीं बतलाता है; हिन्दु मुस्लिम सिक्ख इसाई, में क्यों बँट जाता संसार। जो कहते हैं वह केवल सच, लोग सोचते ऐसा क्यों? सच के वस्त्र झूठ को पहना, झूठ का झूठा कर श्रंगार। ईश्वर की झूठी परिभाषा, है कहानियाँ सब झूठी; "ईश्वर है" यह सिद्ध नहीं है, "ईश्वर नहीं" सिद्ध सौ बार। अशुभ बनाया क्यों इस जग को, अंतर क्यों इंसानों में? बुद्धि हमें क्यों हिंसक दी है, दिये हैं क्यों हिंसक हथियार?? सबमें खून एक ही रँग का, जल वायू अन(अन्न) एक ग्रहण; हिन्दु मुस्लिम सिक्ख इसाई, क्यों है पंडित कोई चमार?? ईश्वर माया ईश्वर जाने, हमें न हो सकता जब ज्ञात; व्यर्थ खोज में फिर हम उसकी, जीवन क्यों करते बेकार??

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

दिनेशभाई नमस्कार मै तो साफ कहता हुं ये मेरे विचार है मानना हो तो मानो नही तो आप की मरजी । व्यक्तिगत विचारमें क्या खराबी है, कौन सी शरम की बात है । लोगों को मानना है तो माने नही मानना हो उनकी मरजी । आप ने पढा मैने कहा था अभी १०० साल डोज देना पडेगा । जरा गौर से दुसरी बार पढ लिजीए, मैने और भी लिखा है वो भी देख लिजीये । आप को क्या नही करना है समज में आ जायेगा । आप का टारगेट जनता नही, अगर पहुंच है तो गुरुओं का समुह ही है । जनता से वो ही निपट सकते हैं । अगर आप लगे रहोगे तो आप खूद गुरु बन जाओगे जो आप नही बनना चाहोगे । १०० सल तक राह देखनी है ऊंट किधर करवट लेता है । शिक्षा और नैतिकता आ जाती है तो धर्मों की जरूरत नही पडेगी । आज का आलम ये है शिक्षा है तो नैतिकता नही और जहां नैतिकता है वहां शिक्षा नही । दोनों साथमे होना जरूरी है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय राजकमल जी प्रथम तो यह विचार व्यक्तिगत नहीं हो सकते। यह विचार प्राचीनकाल से ही ईश्वर और धर्म के जन्म के साथ ही प्रश्न  चिन्ह बनकर खड़े हैं। उत्तर होने की वजह से धर्मान्ध लोंगो ने ऐसे विचारों एवं विचारकों का गला घोटने का काम किया है। धर्म के नाम पर जिनती हत्यायें हुई हैं शायद और किसी कारण से उतनी नहीं हुईं। आज के संचार युग एवं प्रगतिशील समाज में किसी पर आसानी से अपने विचार   नहीं थोपे जा सकते। जैसा कि आपने आरोप लगाया है। यह तो सत्य जानने एवं सत्य कहने का एक प्रयास है। मैंने जितने प्रश्न उठाये हैं क्या आपके पास एक भी प्रश्न का तार्किक उत्तर है? हाँ आपको  एक वचन देता हूँ कि यदि कोई मेरे प्रश्नों  का बुद्धि संम्मत उत्तर दे देगा तो प्रथम तो मैं उसके मत का अनुयायी बन जाऊँगा तथा द्वितीय उसका गुरुत्व भी स्वीकार कर लूँगा। किसी बात को केवल इसलिये मानना कि वह हमारी धार्मिक पुस्तक में लिखी है या हमारे प्रिय या सम्मानीय व्यक्ति ने कहीं है। चाहे वह बात सत्य से परे हो। क्या हमारे प्रतिशील मानव की निशानी है। कृपया अपने निम्न कथन का पूरा करते हुये उसका आशय समझायें।  क्योंकि  मैं इसका अर्थ आपस में वैमनस्यता फैलाने मैं ले रहा हूँ। यदि मैं गलती पर हूं तो कृपया सही रास्ते पर लायें। "हम अभी तक आपस में घी खिचड़ी है वर्ना ….."

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय निशा जी यह पोस्ट केवल उन लोगों पर प्रहार है जो धर्मं को साम्प्रदायिक रूप देकर यहाँ वैमनस्यता फैलाते हैं। धर्म को धन कमाने  का जरिया समझते हैं। और जब हम सवाल उठाते हैं तब या कहीं छिप जाते हैं या फिर धर्म को हिंसक रूप दे देते हैं। जब गलती से कभी ऐसे  लोंगों की फेसबुक पर पहुँच जाते हैं तो वहाँ मारने, काटने और गालियों के अलावा कुछ नहीं मिलता। बीमारी तो उन्हें खुद है और बात करते हैं हमारे आपरेशन की। फिर कैसे खामोश रहा जाय। सभी सम्प्रदायों में करीतियाँ घुस आईं हैं। अपने अपने सम्प्रदाय की कुरीतियों का इलाज कीजिये। यह रचना किसी की आस्था को चोट पहुँचाने के लिये नहीं है, अपितु दूषित मानसिकता के लोगों दूषित बुद्धि पर प्रहार है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय शशि जी सादर प्रणाम. टहला खुले आसमा में भी, चाँद सितरों को भी देखा, हरयाली देखी पौधों की, सुनी पक्षियों की ये कलरव। देखे हैं तूफान बहुत से बारिस की बूँदों भी भीगा, शिशुओं की मासूम अदायें, फूलों की मुस्कान का अनुभव।। कानन, सरिता, पर्वत सागर, झील प्रपात भी देखे अगनित, कोशिश की ब्रम्हांड में देखूँ, शांति मिली न मुझको अब तक। भटकन ही यह शायद जीवन, औ आनन्द दर्द में मिलता, प्रश्न अनेकों, एक नहीं हल, मुझे मिलेगा जाने कब तक।। राह दिखाता रात सदा शशि, मैं सौभाग्य मानता अपना, नेक आपने राह सुझाई, पढ़कर मेरा मन आन्दोलित। राह चला था बीतें बर्षों, हासिल कुछ भी न हो पाया, व्यर्थ जिन्दगी अब तक बीती, क्योंकि वह तो था सब कल्पित।।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

परम आदरणीय a1nur1g, सादर अभिवादान, जिस तरह मेरे विचारों में विरधाभास है (आपके अनुसार) उसी तरह आपकी प्रतिक्रिया में भी विरोधाभास इंगित होता है। एक ओर तो आप मेरे विचारों को उच्च विचारों की संज्ञा देते हैं तथा दूसरी ओर मुझे साधारण अज्ञानी मनुष्य साबित करते हैं। मुझे अपने विचारों की उच्चता एवं निम्नता का तो ज्ञान नहीं है, किन्तु यह सत्य है कि वह पूर्णतः सत्य पर आधारित हैं। आस्तिक का अर्थ सत्य में आस्था रखने से है, न कि उन कही सुनी और लिखी बातों को इसलिये स्वीकार कर लेना कि वे हमारे धर्म ग्रन्थों में लिखी हैं या हमारे पूर्वजों द्वारा कहीं गईं हैं या हमारे सबसे प्रिय समर्थित की गईं हैं। मान्यवर मेरे पास जो भी है उसमें मेरा अपना कुछ नहीं है, सब कुछ यहीं से प्राप्त किया है। यह विचार आपका नहीं है, अपितु जब ईश्वर की उत्पत्ति के विचार के साथ ही उसके न होने का विचार उत्पन्न हुआ था। लेकिन प्राचीन काल में ऐसे विचार रखने वालों को मौत के घट उतार दिया जाता था अथवा इतनी अधिक अमानवीय आतनाये दी जाती थी कि उस व्यक्ति के विचारों में ईश्वर की उत्पत्ति स्वाभाविक रूप से हो जाती थी। गैलैलियों, ईसामसीह, महत्मा बुद्ध आदि कहानियाँ भरी पड़ी हैं ऐसे लोगों की। ईश्वर है लेकिन वह नहीं जो विभिन्न धर्म ग्रन्थों एवं धर्म गुरुओं ने जिसे ईश्वर माना है। इस तरह का ईश्वर तो मनुष्य के डर एवं अज्ञान के स्वार्थ रूपी संसर्ग से उत्पन्न हुआ है। विभिन्न धर्मों के अनुसार तो ईश्वर हमारी बुद्धि के परे है। वह अज्ञेय है, फिर क्यों हम उसके जानने का व्यर्थ प्रयास करके अपने बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ ही नष्ट करते हैं। मैं मानता हूँ कि मेरा ज्ञान बहुत ही अल्प है, एक सागर की बूँद के बराबर। और जो भी है वह मेरा अपना नहीं है, इसी संसार से लिया गया है। किन्तु जितना भी है पूर्णतः सत्य एवं तर्क पर आधारित है। आपने जो टिप्पणी की है यदि वह मेरे प्रश्नों के हल के संबंध में करते तो मुझे अपनी शंकाओं को दूर करने में मदद मिलती। जैसा कि आपने कहा है कि मुझे किसी धर्म गुरू की संगत में जाना चाहिये, मान्यवर कुछ संतो के सानिग्ध में गया था, किन्तु अधिक निकटता पर जाने से ज्ञात हुआ कि वह तो बहुत बड़ ठग है, अपराधी हैं, स्मग्लर हैं, करोड़ों अरबों के स्वामी हैं, अय्यास हैं। इसके बाद स्वयं ही ईश्वर को ढ़ूढने का प्रयास किया, संसार से जो प्राप्त किया वह लिख दिया। मैंने आपनी पूर्व की रचनाओं में भी ईश्वर पर कई गम्भीर आरोप लगायें है जिनका उत्तर न तो किसी ईश्वर ने दिया है और न ही उनके अनुयायी ने, हाँ मेरा विरोध करने में जरूर आतुरता दिखाई है। किसी ने आज तक एक भी ऐसा प्रमाण नहीं दिया है कि हम दावे से एवं तार्किक ढंग से कह सके की यही ईश्वर है, हाँ ईश्वर के न होने के अनगिनत प्रमाण उपलब्ध हैं। मैं धार्मिक ग्रन्थों को झुठला नहीं रहा हूँ, लगभग अधिकांश धार्मिक पुस्तकें जिस समय लिखी गईं थी उस समय के लिये बहुत ही उपयोगी एवं समाज को व्यवस्थित एवं सुचारू रूप से चलाने के लिये लिखी गईं थी, इन्हीं पुस्तकों के परिणाम स्वरूप आज मानव सभ्यता का इनता विकास हुआ है। वह पुस्तकें उस समय का कानून थीं। आज की हमारी धार्मिक पुस्तक हमारे देश की संविधान की पुस्तक है। न्यायालय मंदिर, मस्जिद एवं चर्च आदि हैं। और मजस्टेट उनके पुजारी मौलवी तथा पादरी आदि हैं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

प्रिय आस्तिक जी , विचार व्यक्तिगत होते है ,उनके लिए इतना ............! यूँ तो विचार क्षण भंगुर और अनित्य हैं ! लेकिन जितने समय भी ये रहते है प्रभावशील होते हैं ! इसलिए विचारों को लेकर मर्यादा न तोड़ी जाये ,! लोग विचारों को लेकर इतने आग्रही हो जाते हैं की उनके विचार आवेश का रूप ले लेते हैं !चूँकि मन को अहंकार प्रिय है फलस्वरूप अहंकार का प्रदर्शन विचारों में दृष्टि-गोचर होने लगता है !फिर सारी दृष्टी एकतरफा हो जाती है ! विचारों का अतिआग्रह हमें दृष्टीहीन बना देता है ! तब हम परम सत्य को भी टुकड़े करके देखते हैं ! चार अंधे कहीं जा रहे थे !विचार आया हाथी देखा जाये संयोग से हाथी मिल भी गया चारों ने उसे छुआ फिर एक दुसरे से पूछा ? बताओ हाथी कैसा होता है ?पहले ने कहा वह तो सूपड़े जैसा है क्योंकि उसने कान छुए थे !दूसरा बोला नहीं हाथी रस्सी की तरह है क्योंकि उसने पूँछ छूई थी !तीसरा बोला हाथी खम्भे की तरह है क्योंकि उसने पैर छूए थे ! चौथा बोला तुम सब गलत हो हाथी तो अजगर के सामान है क्योंकि उसने सूंड को छुआ था ! देखा जाये तो चारों के पास सत्य है किन्तु अपूर्ण ! दृष्टी न होने के कारण सत्य खंड-खंड हो गया ! ठीक इसी प्रकार विचारों का अति आग्रह हमें अँधा बना देता है तब हम परम सत्य को भी टुकड़े-टुकड़े कर देखने लगते हैं !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja